Thursday, 30 March 2017

जम्मू कश्मीर में आतंकवाद और पत्थर फेंकने वालो से जूझती इंडियन आर्मी

जैसा की हर रोज देखा जा रहा है जम्मू कश्मीर में हर दिन कोई न कोई नई घटना होती रहती है परंतु  आतंकवाद वहां पर सबसे बड़ा मसला है। जिसे पाकिस्तान के द्वारा पाला पोसा  जा रहा है। जिस कारण वहां पर लगभग हर दिन कोई न कोई भारतीय सैनिक सहीद होता है, हर दिन कोई न कोई माँ का लाल अपने परिवार दूर हो जाता है , जो की हमारे लिए दुर्भाग्य पूर्ण घटना है। और ये सिर्फ एक ही कारण से हो रहा है ,घाटी में आतंकवाद बढ़ने से,  सब सोच रहे होंगे कि हम रोज इतने आतंकवादी मार रहे हे पिर ये रोज रोज कहा से आ जाते है। में कहूंगा कि इनका माय बाप पाकिस्तान इनको पाल पास के घाटी में आतंकवाद फैलाने के लिए भेज रहा है , जिससे हमारे निर्दोष सैनिकों को सहीद होना पड़ रहा जो की हमारे लिए बहुत  दुःखत बात है।
अब घाटी में एक नई चीज और देखने को मिल रही जैसे ही इंडियन आर्मी किसी आतंकवादी के ऊपर कारवाई करती है (कोई ऑपरेशन चलाती है )  वहाँ के नवजवान जिन्हें अलगावादी नेता छोटे बच्चे कह रहे है वो इंडियन आर्मी पे पत्थर , पेट्रोल बम , अदि फेंक रहे रहे है।  अब आप ही बताओ जो अपने ही देश की आर्मी पर ऐसा अत्याचार कर रहे  है, उन्हें हमारे देश के नेता बच्चे बोल रहे। और उनको बचाने की कोशिस कर रहे है , और ये सब कुछ अपनी राजनीति को चमकाने के लिए किया जा रहा है। वैसे ही देश में आतंकवादी कम थे क्या जो अलगावादी नेता उन  बच्चो को भी देश के खिलाप ले आये हैं। सबसे  बड़ी दुःख की बात यह है कि आर्मी और आतंकवाद के बीच में बच्चे मारे जाते है जिसके बाद इसके ऊपर राजनीती होती है। कोई बोलता है निर्दोष मार दिए कोई कहता है बच्चे मार दिए और ये सब कुछ उन अलगावादी नेताओ के कारण हो रहा है।
अभी हालही में इंडियन आर्मी के चीफ ने बयान दिया था कि जो भी आतंकवाद की मद्त करेगा उसके साथ  भी आतंकवादी  जैसा व्यवहार किया जायेगा। में उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूं उन्होंने जो भी कहा सही कहा है परंतु कुछ अलगावादी नेताओ को ये सब हजम नही हो रहा है, जिस कारण वो घाटी में नवजवानों को उकसा रहे हैं, परंतु आप को जानकर हैरानी होगी की इन मुड़भेडो में किसी भी अलगावादी नेता का बेटा और कोई रिश्तेदार को कभी गोली नी लगी। में उन लोगो को कहना चाहता हु जिनके बच्चे गोली खाने के लिए आगे बढ़ते है और आर्मी को अपना काम नही करने देते है , में  उनसे अनुरोध करता हूं कि अपने  बच्चो को समजाये और आर्मी को अपना काम करने दें।
भारत माता की जय

Tuesday, 28 March 2017

भगवा रंग हिन्दू राष्ट्र की शान


जब से योगी आदित्यनाथ  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने है , तब से पूरे देश में भगवा रंग के ऊपर बहुत  टिप्णीया हो रही है। हर न्यूज़ चैनल में उसके उपर डिबेट हो रही ही की भगवा रंग सही है या गलत है। परंतु  इन असमाजिक तत्वो को सही तरीके से भगवा रंग के अर्थ पता ही नही है , तभी ये लोग भगवा के ऊपर टिप्णीया कर रहे हैं।
भगवा रंग का अर्थ होता है बलिदान  दूसरे शब्दों में कहो तो जब साधु संत भागवा धारण कर लेते है तो वो  अपने माँ बाप भाई बहन  सभी का बलिदान कर दते है। अर्थात उन्हें त्याग देते हैं।  परंतु कुछ असमाजिक तत्वो को लगता है, कि जिसने भी  भगवा धारण किया है , वो लोग देश में धुर्वीकरण फैला रहे है। परंतु इन मूर्खो को कोन बतायेगा  की स्वामी विवेकानंद ने  भी भगवा धारण करके देश का कल्याण किया था। स्वामी के बारे में बताया जाता है कि जब उनकी माता की हालत बहुत ही ख़राब थी, तो उनको बुलाने की कोशिस की गयी थी, तो उन्होंने  कहा की  मेरी माँ के और भी बेटे हैं जो उनकी देख रेख कर सकते मेरे लिए तो सिर्फ भारत माता ही सबसे बढ़कर है। जिसकी में सेवा करना चाहता हूँ। तो अब आप लोग समझ ही गये होंगे की भगवा का अर्थ क्या है। 
भगवा रंग हिन्दू राष्ट्र की सान है जिसे झुटलाया नही जा सकता है।  इसी रंग में हमारे राम बसे हुए है, जिससे हर एक हिन्दुओ की भावनाये जुडी हुई है।इसके बावजूद भी भगवा  के ऊपर अंगुलिया उठायी जाती है, अनेक अवधारनाये  बनायी गयी है कि भगवा रंग वाले देश को बाटना चाहते है , परन्तु इन मूर्खो को कोन बतायेगा । इसमें  हमारी आस्था छुपी हुए है।  जितना हमे भगवा रंग से प्यार है उतना ही हमे तिरंगे से प्यार है। इसलिए  उन लोगो से निवेदन करता हूँ जो इसके ऊपर टिप्णी करते हे कृपया  भगवा के ऊपर टिप्णी करना बन्द कर दे। जय श्री राम।

Monday, 20 March 2017

The valley of flowers (फूलो की घाटी)


फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान (the valley of flower) भारत का  एक राष्ट्रीय उद्यान है जो उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। जो की सार्वजनिक  रूप से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। तथा यहां के स्थानीय लोग इसे परीलोक कहते हैं अर्थात परियों का संसार । यह उद्यान चमोली जिले में स्थित है जो की  87.50  किमी क्षेत्र में फैला हुआ है फूलों की घाटी को सन 1982 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था।  यहां तक पहुँचने के लिए चमोली जिले का अन्तिम बस अड्डा गोविन्दघाट 275 किमी दूर है। तथा जोशीमठ से गोविन्दघाट की दूरी 19 किमी है यहाँ से प्रवेश स्थल की दूरी लगभग 13 किमी है जहाँ से पर्यटक 3 किमी लम्बी व आधा किमी चौड़ी फूलोंकी घाटी का  लुप्त ले सकते है,  यहां आ के ऐसा लगता है मानो जैसे आप सचमुच में परियो के संसार में आ गए हैं। परन्तु में तो इसे फूलों से सजा स्वर्ग  कहना चाहूँगा। अनेक प्रकार के फूलों के बीच ऐसे लगता है जैसे आप इस धर्ती से कही और अ गये हैं। और यहां से  नंदा देवी पर्वत के कुछ अलग ही अलौकिक दृश्य देखने को मिलते हैं।


खोज

इस घाटी का पता सबसे पहले ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस. स्मिथ और उनके साथी आर. एल. होल्ड्सवर्थ ने लगाया था। प्रसिद्ध ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक 1931 में गढ़वाल स्थित कामेट शिखर (24,447 फुट) से सफल आरोहण के बाद धौली गंगा के निकट गमशाली गांव से रास्ता भटक जाने के कारण पश्चिम की ओर चले गये थे। जब वो  (16,700)  फुट ऊंचाई का दर्रा पार करके  भ्यूंडार घाटी से जब वह थोड़ा आगे बढ़े तो जब उन्होंने वहां अकल्पनीय सौंदर्य देखा तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। तथा ऐसा  सौंदर्य को देखकर वो स्तब्ध रह गये और अपना टेंट वही गाड़ लिया। वहां से लौटने के पश्चात उन्हें इस घाटी की सुंदरता 1937 में दोबारा यहां खींच लायी तथा यहां पहुंचकर उन्होंने गहन रिसर्च किया और लगभग 300 किस्म के फूलों की प्रजातियों को ढूंढ निकाला। इसके पश्चात उन्होंने ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ नामक पुस्तक लिखी। जिस कारण  फूलों से लदी यह घाटी दुनिया को देखने को मिली। यहां पर छोटे-छोटे नालों के किनारे पूल इस तरह उगे रहते हैं मानो उन्हें क्यारियों में उगाया गया हो।


बेहतर मौसम

87.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली यह घाटी नवम्बर-दिसम्बर से अप्रैल-मई तक बर्फ से पूरी तरह ढकी रहती है। जून में जब बर्फ पिघलना  शुरु होती है तो यह क्षेत्र हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। जुलाई तक यहां के पौधों में फूल महकने लगते अगस्त में फूलों की घाटी  का अलग ही अलौकिक दृश्य देखने को मिलता है। क्योंकि इस दौरान फूल पूरी तरह खिल चुके होते हैं लेकिन अक्टूबर से फूल धीरे-धीरे मुरझाने शुरू हो जाते हैं।


Thursday, 9 March 2017

Auli (औली) the best hill station

 औली भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है, जो की  घूमने आये हुए सैलानियों के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। समुद्र तल से 3050 मीटर (10010 फिट) की ऊँचाई पर यह स्थान बर्फ से  लदालद भरा रहता है।
यहा से हिमालय के  बहुत ही अलौकिक दृश्य देखने को मिलते है, परन्तु यह पहाड़ी इलाका स्कीइंग (skiing ) के लिए पुरे भारत में सबसे ऊपर का स्थान मिला हुआ है, यहा पर साल में 1 बार स्कीइंग का खेल आयोजित होता है, जिसमें देश विदेश के खिलाड़ी हिस्सा लेते है। यहा के लोग औली को औली बुगयाल कहकर पुकारते है। क्योकि यहा पर हरी घास के बड़े बड़े मैदान देखने को मिलते है। निचले इलाके के चरवाहे साल में 1 बार अपने जानवरो को इस बुगयाल में ले के जाते है। जिससे जानवरो को भरपूर मात्रा में  घास चरने को मिल जाती है। और यह सिलसिला सदियों से चलता या रहा है।
औली इतना खूबसूरत पहाड़ी इलाका है कि में ऐसे अपने शब्दों में बया नही कर सकता हू। इस स्वर्ग जैसी जगह से ब्रदीनाथ तथा गंगोत्री के खूबसूरत पहाड़ो का एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है।
ओक के जंगलो के कारण यह पर ठंडी -ठंडी हवाएं बहती है जो की सैलानियों का मन मोह लेती है, इन ठंडी हवाओं के कारण यह का एक अलग ही वातावरण देखने को मिलता है ।
                           कुछ सुन्दर दृश्य
यहां पर घूमने का सबसे उचित समय नवम्बर से लेकर मार्च अंत तक होता है, क्योकि इस समय औली बर्फ की चादर ओढ़े हुए रहता है तथा इसी समय पर यह स्कीइंग का खेल भी आयोजित होता है। जिसमे दूर -दूर से आये हुए खिलाडी हिस्सा लेते है, जिसका यहाँ पर आये हुए सैलानी भरपूर मात्रा में लाभ उठाते है। 

                         सुन्दर घास के मैदान

8वी सदी में महान गुरु अदि शंकराचार्य यहां आये , तभी उन्होंने यह प एक मंदिर की स्थापना की, जो की अपने आप में एक अद्भत मंदिर है। कहते हे की यहां  आये हुआ भक्तो की मन इच्छा अवश्य पूर्ण होती है। इस पहाड़ी इलाके में ज्यादातर भोटिया लोग रहते है जो की कभी तिबत से नाता रखते थे। यहां के लोग दिखते तथा व्यवहार में बहुत ही अच्छे होते है।
औली में 10 साल पहले तक इतना विकास नही हुआ था, उस समय पर स्की के सारे उपकरण ITBP के द्वारा दिये जाते थे । परंतु आज यहाँ की दशा कुछ और है । आज यह पर 3 star होटल तथा अच्छे अच्छे resort भी बन गए है। यह आ के अब ऐसा महसूस  होता है मानो तुम india में नही  switzerland में  आ गये हो।
                        ट्रॉली का लुप्त लेते लोग
                      सायं काल का सुंदर दृश्य

Thursday, 2 March 2017

Natwarlal (नटवरलाल) the indian greatest conman

नटवरलाल का जन्म 1912 में  बिहार (सिवान जिले के बंगरा गांव) में हुआ था। जिनका असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था, जो की अब  नटवरलाल के नाम से जाने जाते है। जिनकी मोत 2009 में हो गयी थी।
ठगी में आने से पहले नटवरलाल एक वकील हुआ करते थे, जो की दिमाग से बहुत ही तेज थे। ठगी में आने के पश्चात  उन्होंने एक से बढ़कर एक कारनामे किये, यहा तक की उन्होंने ताज महल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन तथा भारत के संसद भवन को  उसके  545 मेम्बर्स के साथ बेच डाला था, तथा ताजमहल को तो उन्होंने 2 बार बेच दिया था। वो ठगी का शिकार  दूसरे देश से आये  हुए सैलानियो तथा वह के लोगो को बनाते थे। परन्तु यह  कहना भी गलत होगा की वो दूसरे देश के  ही लोगो को ठगी का शिकार बनाते थे, उन्होंने  भारत  में टाटा , बिरला तथा धीरूभाई अंबानी जैसे बड़े व्यसायी लोगो को भी अपना ठगी का शिकार बनाया। इस काम के लिए उन्होंने खुद को सोशल मेम्बर बता कर अंजाम दिया। तथा उन्होंने भारत में अनेक दुकानदारों को भी अपने ठगी का शिकार बनाया।  अपने पुरे जीवन काल में 100 से अधिक लोगो से करोड़ो रूपये की ठगी की, इन कामो को अंजाम देने के लिए नटवरलाल ने 50 से अधिक चहरे बदले।  वह चहरे बदलने तथा किसी बड़ी हस्ती  के singnature करने में माहिर थे, तथा वह  ठगी करने के लिए नये - नये विचार सोचने में भी मास्टर थे।
नटवरलाल 100 से अधिक आपराधिक मामलो में
लिप्त थे, तथा 8 से अधिक राज्यि की पुलिस ने उन्हें आपराधिक करार दिया था, जिसके लिए उन्हें 113 साल की सजा सुनाई गई थी।  इसके बावजूद भी वो 8 बार जेलो से भागने में कामयाब  रहे थे, परन्तु 9 बार  भी पकड़े जाने बाद वो जेल से भागने में कामयाब हो गए थे।  113 सालो की कारावास में उन्होंने लगभग 20 साल जेल में बिताए। अंतिम बार पुलिस ने उन्हें 1996 में पकडा था, जब वो 86 के हो चुके थे । परन्तु वो इस बार भी पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहे और फरार हो गए। अंतिम बार उनको नई देहली के रेलवे स्टेशन पे देखा गया था उसके बाद उन्हें कभी किसी ने नही देखा गया। उनके वकील ने 2009 में उनके मौत की खबर देकर सबको  चौका दिया था।

Monday, 27 February 2017

कौसानी (Kausani the switzerland of indian)

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से 53 km दूर  कौसानी  स्थित है, यह भारत के सर्वोत्तम पर्यटक सस्थलों में सुमार है। जहाँ से हिमालय ( नंदा देवी पर्वत ) का आलौकिक दृश्य देखने को मिलता है।यह पिंगनाथ चोटी पर बसा हुआ बागेस्वर जिले में अता है। कोसी और  गोमती नदियों के बीचोबीच बसा कौसानी भारत का स्विट्ज़रलैंड कहलाता  है।
अगर आपको हिमालय के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाना है तो उत्तराखंड में स्थित कौसानी सबसे अच्छा पर्यटक स्थल है। समुद्र तल से 6075 फीट की ऊंचाई पर उत्तराखंड (भारत) में बसा कौसानी एक खूबसूरत प्राकृतिक पर्यटक स्थल है। विशाल हिमालय के अलावा यहां से नंदाकोट, त्रिशूल और नंदा देवी पर्वत का आलौकिक दृश्य देखने को मिलता है। एक बार महात्मा गांधी जैसे महान हस्ती यहाँ आये थे, उन्हें यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य इतना  अच्छा लगा की वह यहाँ कुछ दिन ठहरे। तभी उन्होंने इस जगह को भारत का स्विटजरलैंड कहा।  तब से यह भारत का स्वीटजरलैंड के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में कौसानी एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है , और हर साल यहाँ पूरे विश्व से पर्यटक आते हैं। तथा प्रकृति की गोद में फैले हुए हसीन नजारों को कैद कर के ले जाते हैं।


यहाँ से हिमालय के दर्शन तो ऐसे होते हैं जैसे हाथ से लपक लें। सुबह-सुबह हिमालय से उगता सूरज और शाम को सूरज डूबने पर हिमालय पर पडऩे वाली पीली किरणों से ऐसा लगता है मानो स्वर्ग में आ गए हो। यहां चीड़ के घने पेड़ों के बीचोबीच  बसे कौसानी से सोमेश्वर, गरुड़ और बैजनाथ कत्यूरी की सुंदर घाटियों का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। सबसे ज्यादा जो चीज पर्यटकों को यहाँ लुभाती है वो यहाँ का शांत माहौल तथा सुन्दर वातावण है। कौसानी  में खूबसूरत पहाडिय़ों और पर्वतों के अलावा कौसानी आश्रमों, मंदिरों और चाय के बगानों के लिए भी जाना जाता है।

 अनाशक्ति आश्रम

 यहां का एक प्रसिद्ध आश्रम है, जहां महात्मा गांधी कुछ दिन के लिए रुके थे। इस स्थान के बारे में महात्मा गांधी ने लिखा था कि अनाशक्ति का अर्थ होता है- ऐसा योगा जिससे आप संसार से अगल होकर पूर्ण रूप से ध्यान मग्न होते हैं। उनकी जिंदगी से जुड़ी कई किताबें और फोटोग्राफ इस आश्रम में उपलब्ध हैं। यह जगह अब अध्ययन और शोध केन्द्र में बदल गया है।

लक्ष्मी आश्रम

 यह एक और जाना माना आश्रम है, इसे सरला आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। इस आश्रम का निर्माण 1948 में महात्मा गांधी की एक अनुयायी कैथरीन हिलमन ने करवाया था। तथा महान कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मभूमि भी यही है। यहाँ एक संग्रहालय भी है, जिसे सुमित्रानंदन पंथ गैलरी के नाम से जाना जाता है। इसमें इस महान कवि की कविताओं की पांडुलिपि, विभिन्न कृतियां और उन्हें दिए गए अनेक पुरुस्कारों का संग्रह भी है। संग्राहल में हर वर्ष उनका जन्मदिन मनाया जाता है और उनके सम्मान में एक सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है।

ट्रेकिंग

पर्यटक यहाँ ट्रेकिंग और रॉक क्लाइंबिंग (चट्टानों की चढ़ाई) भी कर सकते है, सुंदर धुंगा ट्रेक, पिण्डारी ग्लेशियर ट्रेक और मिलम ग्लेशियर ट्रेक में आप ट्रेकिंग का आनंद ले सकते है 

 चाय बगान 

कौसानी से 5 किमी दूर बागेश्वर रोड पर  चाय बागान स्थित है। यह बगान 21 भागों में बंटा हुआ है और 208 हेक्टियर में फैला हुआ है। उत्तरांचल की मशहूर ‘गिरियास टी का उत्पादन यहीं होता है। इसके अलावा यहाँ जैविक चाय का भी उत्पादन किया जाता है, और इस खुशबूदार चाय को संयुक्त राष्ट्र, जर्मनी, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया में निर्यात किया जाता है। यहां जाने का सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून का होता है । क्योकि इस दौरान पूरे भारत के शहरों में गर्मियो का दौर होता है, मगर यहां पर गर्मी बिल्कुल भी नहीं होती है। इस समय यहां मौसम काफी खुशगवार रहता है।ठहरने की व्यवस्थायहां पर रहने के  लिए अच्छे होटल्स, लॉज बने है। यहां करीब 70-100 के बीच छोटे-बड़े होटल हैं। यहां रीजनेबल रेट पर होटल मिल जाते हैं। कुछ ऐसे होटल भी हैं जिनमें फाइव स्टार और थ्री स्टार की सुविधा मिलती है। इनमें होटल कृष्णा, सागर, सन इन सनो इन, सुमन आदि प्रमुख हैं।
 सबसे बड़ी बाद यह है कि यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। 
 यह काठगोदाम से १५० किलोमीटर दूर है। जब आप काठगोदाम से पहाड़ की सैर करते हैं तो सारी थकान छू मंतर हो जाती है। रास्ते में प्राकृतिक सौंदर्य से लिपटे पहाड़, कलकल की आवाज करती नदियां, झरनों के आपका दिल असीम आनंद से भर उठेगा। 







Friday, 24 February 2017

THE QUEEN OF HILLS MUSSOORI (पहाड़ो की रानी मसूरी)


 जैसा की हम सभी जानते है, मसूरी  एक पर्वतीय इलाका है , जिसे पहाड़ो की रानी के नाम से भी जाना जाता है। यह उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लगभग 35 km दूर तथा देहली से 350 km दूर है।
जो की गढ़वाल हिमलयी  क्षेत्र में आता है यह समुद्र तल से लगभग 1880 मीटर (6170फिट) की ऊँचाई पर है, जिस कारण यह पर छोटे - छोटे  हरे - भरे  पहाडियाँ है। जिनपर भिन्न - भिन्न फूल और छोटे - छोटे झरने दिखाई देते है , तथा इस क्षेत्र में  बहुत अधिक मात्रा में बर्फ गिरती है जिस कारण यह का मौसम बहुत ही ठंडा रहता है , जो की पर्यटकों को बहुत भाता है। यह  से देहरादून  और  हिमालयी पर्वतों का एक अलौकिक दृश्य देखने को मिलता है।
सर्वप्रथम मसूरी की खोज Lt. Frederick Young
के द्वारा की गयी थी, जिनका जन्म 30 नवम्बर 1780  को ( Green Castle, Moville, Ireland, में हुआ था  एवं उनकी मृत्यु 24 मई 1874 में  Ireland में हुए थी। एक बार  Lt. Young  इस पहाड़ पे  किसी काम के सिलसिले  में  आये  हुए थे। जब उन्होंने वह की सुंदरता देखी तो उनके मन में विचार आया की क्यो ना यह पर एक  hunting lodge ( shooting box) बनवा दिया जाये।  परन्तु इतना सब करने के बाद भी young से जुडी कोई यादगार चीज आज वहा दिखने को नही मिलती है।
अगर आप ने मसूरी  की वादियों में जाने का प्लान बनाया हुआ है तो पहले वहां अपने ठहरने की व्यवस्था सुनिश्चित कर लें. मसूरी जाने पर अनेक होटल व रिजौर्ट्स मिलेंगे लेकिन यहां के मसूरी गेटवे रिजौर्ट की बात ही कुछ अलग है. यह से  प्रकृति के भरपूर दर्शन किए जा सकते हैं. तथा मसूरी की हसीन वादियों भी देखते  को मिलती है।
मसूरी  से लगभग 25 km की  दूर  टिहरी रोड पर स्थित शांत सी जगह धनोल्टी है इस के मार्ग में चीड़ और देवदार के जंगलों के बीच बुरानखांडा से हिमालय का शानदार दृश्य देखा जा सकता है.
मसूरी में छोटे - छोटे जलप्रपात भी दिखने को मिलते है परंतु यह का केम्पटी फौल बहुत ही famous है,
ऊंचे पहाड़ों से गिरता यह जलप्रपात इस वादी का खास आकर्षण है. यह जगह मसूरी से 15 किलोमीटर दूर स्थित है. यहां उपलब्ध नौकायन और टौय ट्रेन की सुविधा बच्चों को खास लुभाती है. यही नहीं, यह स्थल पिकनिक मनाने के इच्छुक लोगों में बहुत लोकप्रिय है. यह झरना 5 अलग - अलग धाराओं में बहता है।  यह स्थल समुद्रतल से 4,500 फुट की ऊंचाई पर है। गर्मियों में यहा बहुत ही अधिक मात्रा में पर्यटक देखने को मिलते है। जो की भरपूर मात्रा में यह का आनन्द लेते है।

गन हिल

यह मसूरी की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है यहा तक पहुंचने का सफर आप रोपवे के जरिए कर सकते हैं. 20 मिनट का यह रोमांचकारी सफर आप जिंदगी भर नहीं भूलेंगे , यहां से  विभिन्न शृंखलाओं, जैसे बदरपूंछ, श्रीकंठ, पीठवारा व गंगोतरी ग्रुप के अनुपम सौंदर्य को भी भरपूर रूप से देखा जा सकता है।

सर जौर्ज  एवरेस्ट 

मसूरी  से 6 किलोमीटर की दूरी पर भारत के प्रथम सर्वेयर जनरल सर जौर्ज एवरेस्ट की ‘दि पार्क एस्टेट’ है. उन का आवास और कार्यालय यहीं था. यहां ऊपर सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है. विश्व की सब से ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है यह आप को इस महसूस  होगी की आप बदलो से ऊपर आ गए है,  मानो जैसे स्वर्ग में घूम रहे हो। मसूरी से लगभग 6 किलोमीटर दूर पर  मसूरी झील भी है।  यहां पैडल बोट उपलब्ध रहती है. यहां से दून घाटी और आसपास के गांवों का सुंदर दृश्य दिखाई देता है 

वाम चेतना केंद्र

 टिहरी बाईपास रोड पर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर विकसित किया गया यह एक पिकनिक स्पौट है. इस के आसपास पार्क हैं जो देवदार के जंगलों और फूलों की झाडि़यों से घिरे हैं. यहां तक पैदल या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है. पार्क में वन्यप्राणी, जैसे घुरार, हिमालयी मोर, मोनल जंगली जानवर देखने को मिलते है।

क्लाउड एंड 

 यह स्थान भी मसूरी में है, वर्ष 1838 में एक ब्रिटिश मेजर द्वारा बनवाया गया यह पुराना बंगला है जी की  अब होटल में परिवर्तित हो चुका है. चारों तरफ घने जंगलों से घिरे इस बंगले से आप को बर्फ की चादर ओढ़े हिमालय पर्वतमाला व यमुना नदी का मनोरम दृश्य देख सकते हैं।



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