Monday, 27 February 2017

कौसानी (Kausani the switzerland of indian)

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से 53 km दूर  कौसानी  स्थित है, यह भारत के सर्वोत्तम पर्यटक सस्थलों में सुमार है। जहाँ से हिमालय ( नंदा देवी पर्वत ) का आलौकिक दृश्य देखने को मिलता है।यह पिंगनाथ चोटी पर बसा हुआ बागेस्वर जिले में अता है। कोसी और  गोमती नदियों के बीचोबीच बसा कौसानी भारत का स्विट्ज़रलैंड कहलाता  है।
अगर आपको हिमालय के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाना है तो उत्तराखंड में स्थित कौसानी सबसे अच्छा पर्यटक स्थल है। समुद्र तल से 6075 फीट की ऊंचाई पर उत्तराखंड (भारत) में बसा कौसानी एक खूबसूरत प्राकृतिक पर्यटक स्थल है। विशाल हिमालय के अलावा यहां से नंदाकोट, त्रिशूल और नंदा देवी पर्वत का आलौकिक दृश्य देखने को मिलता है। एक बार महात्मा गांधी जैसे महान हस्ती यहाँ आये थे, उन्हें यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य इतना  अच्छा लगा की वह यहाँ कुछ दिन ठहरे। तभी उन्होंने इस जगह को भारत का स्विटजरलैंड कहा।  तब से यह भारत का स्वीटजरलैंड के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में कौसानी एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है , और हर साल यहाँ पूरे विश्व से पर्यटक आते हैं। तथा प्रकृति की गोद में फैले हुए हसीन नजारों को कैद कर के ले जाते हैं।


यहाँ से हिमालय के दर्शन तो ऐसे होते हैं जैसे हाथ से लपक लें। सुबह-सुबह हिमालय से उगता सूरज और शाम को सूरज डूबने पर हिमालय पर पडऩे वाली पीली किरणों से ऐसा लगता है मानो स्वर्ग में आ गए हो। यहां चीड़ के घने पेड़ों के बीचोबीच  बसे कौसानी से सोमेश्वर, गरुड़ और बैजनाथ कत्यूरी की सुंदर घाटियों का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। सबसे ज्यादा जो चीज पर्यटकों को यहाँ लुभाती है वो यहाँ का शांत माहौल तथा सुन्दर वातावण है। कौसानी  में खूबसूरत पहाडिय़ों और पर्वतों के अलावा कौसानी आश्रमों, मंदिरों और चाय के बगानों के लिए भी जाना जाता है।

 अनाशक्ति आश्रम

 यहां का एक प्रसिद्ध आश्रम है, जहां महात्मा गांधी कुछ दिन के लिए रुके थे। इस स्थान के बारे में महात्मा गांधी ने लिखा था कि अनाशक्ति का अर्थ होता है- ऐसा योगा जिससे आप संसार से अगल होकर पूर्ण रूप से ध्यान मग्न होते हैं। उनकी जिंदगी से जुड़ी कई किताबें और फोटोग्राफ इस आश्रम में उपलब्ध हैं। यह जगह अब अध्ययन और शोध केन्द्र में बदल गया है।

लक्ष्मी आश्रम

 यह एक और जाना माना आश्रम है, इसे सरला आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। इस आश्रम का निर्माण 1948 में महात्मा गांधी की एक अनुयायी कैथरीन हिलमन ने करवाया था। तथा महान कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मभूमि भी यही है। यहाँ एक संग्रहालय भी है, जिसे सुमित्रानंदन पंथ गैलरी के नाम से जाना जाता है। इसमें इस महान कवि की कविताओं की पांडुलिपि, विभिन्न कृतियां और उन्हें दिए गए अनेक पुरुस्कारों का संग्रह भी है। संग्राहल में हर वर्ष उनका जन्मदिन मनाया जाता है और उनके सम्मान में एक सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है।

ट्रेकिंग

पर्यटक यहाँ ट्रेकिंग और रॉक क्लाइंबिंग (चट्टानों की चढ़ाई) भी कर सकते है, सुंदर धुंगा ट्रेक, पिण्डारी ग्लेशियर ट्रेक और मिलम ग्लेशियर ट्रेक में आप ट्रेकिंग का आनंद ले सकते है 

 चाय बगान 

कौसानी से 5 किमी दूर बागेश्वर रोड पर  चाय बागान स्थित है। यह बगान 21 भागों में बंटा हुआ है और 208 हेक्टियर में फैला हुआ है। उत्तरांचल की मशहूर ‘गिरियास टी का उत्पादन यहीं होता है। इसके अलावा यहाँ जैविक चाय का भी उत्पादन किया जाता है, और इस खुशबूदार चाय को संयुक्त राष्ट्र, जर्मनी, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया में निर्यात किया जाता है। यहां जाने का सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून का होता है । क्योकि इस दौरान पूरे भारत के शहरों में गर्मियो का दौर होता है, मगर यहां पर गर्मी बिल्कुल भी नहीं होती है। इस समय यहां मौसम काफी खुशगवार रहता है।ठहरने की व्यवस्थायहां पर रहने के  लिए अच्छे होटल्स, लॉज बने है। यहां करीब 70-100 के बीच छोटे-बड़े होटल हैं। यहां रीजनेबल रेट पर होटल मिल जाते हैं। कुछ ऐसे होटल भी हैं जिनमें फाइव स्टार और थ्री स्टार की सुविधा मिलती है। इनमें होटल कृष्णा, सागर, सन इन सनो इन, सुमन आदि प्रमुख हैं।
 सबसे बड़ी बाद यह है कि यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। 
 यह काठगोदाम से १५० किलोमीटर दूर है। जब आप काठगोदाम से पहाड़ की सैर करते हैं तो सारी थकान छू मंतर हो जाती है। रास्ते में प्राकृतिक सौंदर्य से लिपटे पहाड़, कलकल की आवाज करती नदियां, झरनों के आपका दिल असीम आनंद से भर उठेगा। 







Friday, 24 February 2017

THE QUEEN OF HILLS MUSSOORI (पहाड़ो की रानी मसूरी)


 जैसा की हम सभी जानते है, मसूरी  एक पर्वतीय इलाका है , जिसे पहाड़ो की रानी के नाम से भी जाना जाता है। यह उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लगभग 35 km दूर तथा देहली से 350 km दूर है।
जो की गढ़वाल हिमलयी  क्षेत्र में आता है यह समुद्र तल से लगभग 1880 मीटर (6170फिट) की ऊँचाई पर है, जिस कारण यह पर छोटे - छोटे  हरे - भरे  पहाडियाँ है। जिनपर भिन्न - भिन्न फूल और छोटे - छोटे झरने दिखाई देते है , तथा इस क्षेत्र में  बहुत अधिक मात्रा में बर्फ गिरती है जिस कारण यह का मौसम बहुत ही ठंडा रहता है , जो की पर्यटकों को बहुत भाता है। यह  से देहरादून  और  हिमालयी पर्वतों का एक अलौकिक दृश्य देखने को मिलता है।
सर्वप्रथम मसूरी की खोज Lt. Frederick Young
के द्वारा की गयी थी, जिनका जन्म 30 नवम्बर 1780  को ( Green Castle, Moville, Ireland, में हुआ था  एवं उनकी मृत्यु 24 मई 1874 में  Ireland में हुए थी। एक बार  Lt. Young  इस पहाड़ पे  किसी काम के सिलसिले  में  आये  हुए थे। जब उन्होंने वह की सुंदरता देखी तो उनके मन में विचार आया की क्यो ना यह पर एक  hunting lodge ( shooting box) बनवा दिया जाये।  परन्तु इतना सब करने के बाद भी young से जुडी कोई यादगार चीज आज वहा दिखने को नही मिलती है।
अगर आप ने मसूरी  की वादियों में जाने का प्लान बनाया हुआ है तो पहले वहां अपने ठहरने की व्यवस्था सुनिश्चित कर लें. मसूरी जाने पर अनेक होटल व रिजौर्ट्स मिलेंगे लेकिन यहां के मसूरी गेटवे रिजौर्ट की बात ही कुछ अलग है. यह से  प्रकृति के भरपूर दर्शन किए जा सकते हैं. तथा मसूरी की हसीन वादियों भी देखते  को मिलती है।
मसूरी  से लगभग 25 km की  दूर  टिहरी रोड पर स्थित शांत सी जगह धनोल्टी है इस के मार्ग में चीड़ और देवदार के जंगलों के बीच बुरानखांडा से हिमालय का शानदार दृश्य देखा जा सकता है.
मसूरी में छोटे - छोटे जलप्रपात भी दिखने को मिलते है परंतु यह का केम्पटी फौल बहुत ही famous है,
ऊंचे पहाड़ों से गिरता यह जलप्रपात इस वादी का खास आकर्षण है. यह जगह मसूरी से 15 किलोमीटर दूर स्थित है. यहां उपलब्ध नौकायन और टौय ट्रेन की सुविधा बच्चों को खास लुभाती है. यही नहीं, यह स्थल पिकनिक मनाने के इच्छुक लोगों में बहुत लोकप्रिय है. यह झरना 5 अलग - अलग धाराओं में बहता है।  यह स्थल समुद्रतल से 4,500 फुट की ऊंचाई पर है। गर्मियों में यहा बहुत ही अधिक मात्रा में पर्यटक देखने को मिलते है। जो की भरपूर मात्रा में यह का आनन्द लेते है।

गन हिल

यह मसूरी की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है यहा तक पहुंचने का सफर आप रोपवे के जरिए कर सकते हैं. 20 मिनट का यह रोमांचकारी सफर आप जिंदगी भर नहीं भूलेंगे , यहां से  विभिन्न शृंखलाओं, जैसे बदरपूंछ, श्रीकंठ, पीठवारा व गंगोतरी ग्रुप के अनुपम सौंदर्य को भी भरपूर रूप से देखा जा सकता है।

सर जौर्ज  एवरेस्ट 

मसूरी  से 6 किलोमीटर की दूरी पर भारत के प्रथम सर्वेयर जनरल सर जौर्ज एवरेस्ट की ‘दि पार्क एस्टेट’ है. उन का आवास और कार्यालय यहीं था. यहां ऊपर सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है. विश्व की सब से ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है यह आप को इस महसूस  होगी की आप बदलो से ऊपर आ गए है,  मानो जैसे स्वर्ग में घूम रहे हो। मसूरी से लगभग 6 किलोमीटर दूर पर  मसूरी झील भी है।  यहां पैडल बोट उपलब्ध रहती है. यहां से दून घाटी और आसपास के गांवों का सुंदर दृश्य दिखाई देता है 

वाम चेतना केंद्र

 टिहरी बाईपास रोड पर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर विकसित किया गया यह एक पिकनिक स्पौट है. इस के आसपास पार्क हैं जो देवदार के जंगलों और फूलों की झाडि़यों से घिरे हैं. यहां तक पैदल या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है. पार्क में वन्यप्राणी, जैसे घुरार, हिमालयी मोर, मोनल जंगली जानवर देखने को मिलते है।

क्लाउड एंड 

 यह स्थान भी मसूरी में है, वर्ष 1838 में एक ब्रिटिश मेजर द्वारा बनवाया गया यह पुराना बंगला है जी की  अब होटल में परिवर्तित हो चुका है. चारों तरफ घने जंगलों से घिरे इस बंगले से आप को बर्फ की चादर ओढ़े हिमालय पर्वतमाला व यमुना नदी का मनोरम दृश्य देख सकते हैं।



Wednesday, 22 February 2017

the history of Nanda Devi Rajjat (नंदा देवी राजजात)


नन्दा देवी राजजात भारत के उत्तराखंड राज्य में होने वाली एक नन्दा देवी की एक धार्मिक यात्रा है। यह उत्तराखंड  के कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध सांस्कृतिक में से एक है। यह लगभग 12 वर्षों के बाद आयोजित होती है। अन्तिम जात 2014 हुयी थी। अगली राजजात सन् 2026 में होगी ।
इस यात्रा में लगभग 240  किलोमीटर की दूरी , नौटी से होमकुण्ड तक पैदल करनी पड़ती है। तथा जंगलो में पथरीले मार्गों एवं दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों से गुजरना पड़ता है। इस महापर्व में अलग-अलग रास्तों से ये डोलियाँ यात्रा में मिलती है। इसके अलावा गाँव-गाँव से डोलियाँ और छतौलियाँ भी इस यात्रा में शामिल होती है। कुमाऊँ अल्मोडा, कटारमल और नैनीताल से भी डोलियाँ नन्दकेशरी में आकर राजजात में शामिल होती है। नौटी से शुरू हुई इस यात्रा का दूसरा पड़ाव इड़ा-बधाणीं में होता है।  तथा फिर यात्रा लौठकर नौटी आती है। इसके बाद कासुंवा, सेम, कोटी, भगौती, कुलसारी,चैपडों, लोहाजंग, वाँण, बेदनी, पातर नचौणियाँ से विश्व-विख्यात रूपकुण्ड, शिला-समुद्र, होमकुण्ड से चनण्याँघट (चंदिन्याघाट), सुतोल से घाट होते हुए नन्दप्रयाग और फिर नौटी आकर यात्रा पूरी हो जाटी है। इस यात्रा की दूरी करीब 280 किलोमीटर है।
 सबसे महत्वपूण बात यह है कि इस राजजात में चौसिंग्या खाडू़ (चार सींगों वाला भेड़) भी शामिल किया जाता है जोकि स्थानीय क्षेत्र में राजजात का समय आने के पूर्व ही पैदा हो जाता है, उसकी पीठ पर रखे गये दोतरफा थैले में श्रद्धालु गहने, श्रंगार-सामग्री व अन्य हल्की भैंट देवी के लिए रखते हैं, जोकि होमकुण्ड में पूजा होने के बाद उसे छोड़ दिया जाता है इसके बाद वह आगे हिमालय की ओर प्रस्थान कर लेता है। लोगों की मान्यता है कि चौसिंग्या खाडू़ बिकट हिमालय में जाकर लुप्त हो जाता है व नंदादेवी के क्षेत्र कैलाश में प्रवेश कर जाता है। इस माह पर्व  में चौसिंग्या खाडू का एक विशेष स्थान दिया गया है।
मान्यताओं के अनुसार राजजात तब होती है जब देवी का  प्रकोप लगने के लक्षण दिखाई देते हैं। काशुओ के कुंवर (राज वंशज) नौटी गाँव जाकर राजजात की मनौती करते हैं। कुंवर रिंगाल की छतोली (छतरी) और चौसिंग्या खाडू़ (चार सींगों वाला भेड़) लेकर आते हैं। चौसिंगा खाडू का जन्म लेना राजजात की एक खास बात है। नौटियाल और कुँवर लोग नन्दा के उपहार को चौसिंगा खाडू की पीठ पर होमकुण्ड तक ले जाते हैं। वहाँ से खाडू अकेला ही आगे बढ़ जाता है। खाडू के जन्म साथ के ही विचित्र चमत्कारिक घटनाये शुरु होनी  हो जाती है। जिस गौशाला में यह जन्म लेता है उसी दिन से वहाँ शेर आना प्रारम्भ कर देता है और जब तक खाडू़ का मालिक उसे राजजात को अर्पित करने की प्रतिज्ञा नहीं रखता तब तक शेर लगातार आता ही रहता है।
 चौसिंग्या खाडू के नेतृत्व में चलने वाली यह  यात्रा  दुनियां की दुर्गमतम्, जटिलतम और विशालतम् धार्मिक पैदल यात्राओं में सुमार है यह यात्रा पुरे 19 दिनों तक चलती है। खतरनाक पहाड़ी चढ़ाई वाले रास्तों से गुजरने वाली यह दुर्गम यात्रा न केवल पैदल तय करनी होती है बल्कि 53 किमी तक इसमें नंगे पांव भी चलना होता है। इतिहासकारों के अनुसार धार्मिक मनोरथ की पूर्ति और इस यात्रा को सफल बनाने के लिये प्राचीनकाल में नरबलि की प्रथा थी जो कि अंग्रेजी हुकूमत आने के बाद 1831 में प्रतिबन्धित कर दी गयी। उसके बाद अष्टबलिकी प्रथा काफी समय तक चलती रही। इतिहासकार डॉ॰ शिवप्रसाद डबराल और डॉ॰ शिवराज संह रावत ”निसंग” के अनुसार नरबलि के बाद इस यात्रा में 600 बकरियों और 25 भैंसों की बलि देने की प्रथा चलती रही मगर इसे भी 1968 में समाप्त कर दिया गया। नन्दा देवी राजजात के बारे में उत्तराखण्ड के विभिन्न खण्डों में गढ़वाल का इतिहास लिखने वाले प्रख्यात इतिहासकार डॉ॰ शिप्रसाद डबराल ने ”उत्तराखण्ड यात्रा दर्शन” में लिखा है कि नन्दा महाजाति खसों की आराध्य देवी है। ब्रिटिश काल से पहले प्रति बारह वर्ष नन्दा को नरबलि देने की प्रथा थी। बाद में इस प्रथा को बन्द कर दिया गया मगर ”दूधातोली प्रदेश में भ्रमण के दौरान मुझे सूचना मिली कि उत्तर गढ़वाल के कुछ गावों में अब नर बलि ने दूसरा रूप धारण कर लिया। प्रति 12 वर्ष में उन गावों के सयाने लोग एकत्र हो कर किसी अतिवृद्ध को नन्दा देवी को अर्पण करने के लिये चुनते हैं। उचित समय पर उसके केश, नाखून काट दिये जाते हैं। और उसे स्नान करा कर तिलक लगाया जाता है, फिर उसके सिर पर नन्दा के नाम से ज्यूंदाल (चांवल, पुष्प, हल्दी औरजल मिला कर) डाल देते हैं। उस दिन से वह अलग मकान में रहने लगता है और दिन में एक बार भोजन करता है। उसके परिवार वाले उसकी मृत्यु के बाद होने वाले सारे संस्कार पहले ही कर डालते हैं। वह एक वर्ष के अन्दर ही मर जाता है।


इस पैदल यात्रा में उच्च हिमालय की ओर चढ़ाई चढ़ते जाने के साथ ही यात्रियों का रोमांच  और भी बढ़ता जाता है। इसका पहला पड़ाव 10 किलोमीटर पर ईड़ा बधाणी है। उसके बाद दो पड़ाव नौटी में होते हैं। नौटी के बाद सेम, कोटी, भगोती, कुलसारी, चेपड़ियूं, नन्दकेशरी, फल्दिया गांव, मुन्दोली, वाण, गैरोलीपातल, पातरनचौणियां होते हुये यात्रा शिलासमुद्र होते हुये अपने गन्तव्य होमकुण्ड पहुंचती है। इस कुण्ड में पिण्डदान और पूजा अर्चना के बाद चौसिंग्या खाडू को हिमालय की चोटियों की ओर विदा करने के बाद यात्रा नीचे उतरने लगती है। उसके बाद यात्रा सुतोल, घाट और नौटी लौट आती है। इस यात्रा के दौरान लोहाजंग ऐसा पड़ाव है जहां आज भी बड़े पत्थरों और पेड़ों पर लोहे के तीर चुभे हुये हैं। कुछ तीर संग्रहालयों के लिये निकाल लिये गये हैं। परन्तु कुछ अभी भी वहा दिखायी देते है।  ऐसा लगता  है कि कभी इस स्थान पर भयंकर युद्ध हुआ होगा। इसी मार्ग पर 17500 फुट की ऊंचाई पर ज्यूंरागली भी है जिसे पार करना बहुत ही जोखिम का काम है। इतिहासकार मानते हैं कि कभी लोग स्वर्गारोहण की चाह में इसी स्थान से महाप्रयाण के लिये नीचे रूपकुण्ड की ओर छलांग लगाते थे। यमुना दत्त वैष्णव ने इसे मृत्यु गली की संज्ञा दी है। यहां से नीचे छलांग लगाने वालों के साथ ही दुर्घटना में मारे गये सेकड़ों यात्रियों के कंकाल नीचे रूपकुण्ड में मिले हैं जिनकी पुष्टि डीएनए से हुयी है। इसके बाद यात्रा शिला समुद्र की ओर नीचे उतरती है। राजजात के मार्ग में हिमाच्छादित शिखरों से घिरी रूपकुण्ड झील है जिसके रहस्यों को सुलझाने के लिये भारत ही नहीें बल्कि दुनियां के कई देशों के वैज्ञानिक दशकों से अध्ययन कर रहे हैं। समुद्रतल से 16200 फुट की उंचाई पर स्थित रूपकुण्ड झील के आस पास अभी भी  कंकालों के साथ टी आभूषण, राजस्थानी जूते, पान सुपारी, के दाग लगे दांत, शंख, शंख की चूड़ियां आदि सामग्री बिखरी पड़ी है। इन कंकालों के परीक्षण से जो बात चौंकाने वाली सामने आई है यह है कि ये कंकाल 9वीं सदी के हैं तथा ये लगभग सभी एक ही समय में मरे हुये लोगों के हैं। इनमें स्थानीय लोगों के कंकाल बहुत कम हैं। बाकी लगभग सभी एक ही प्रजाति के हैं। इनमें दो खोपड़ियां ऐसी भी मिली थी। जो कि महाराष्ट्र की एक खास ब्राह्मण जाति के डीएनए तथा सिर के कंकाल की बनावट से मिलते हैं। कहा जाता है कि ये कंकाल यशोधवल, उसकी रानियों, नर्तकियों, सैनिकों, सेवादारों या कहारों और साथ में चल रहे दो ब्राह्मणों के रहे होंगे।

Tuesday, 21 February 2017

bedini bugyal the best treking place





Bedini  bugyal is a Himalayan Alpine  meadow, which is situated at an elevation of  3,354 meters in the chamoli district of uttarakhand state of indian. Bedini fall on the way of roop kund near wan village. This lush green meadow is adorned with Blooms in a wide range of varieties. The Trisul and Nanda Ghunti are clearly visible from here. There are a small lake named (beini kund) in bedini bugyal.
The trek to bedini bugyal and ali bugyal through lush green grassy land, conifer Forest  clinging into the slopes of hills and  steep climbs. Bedini kund in bedini bugyal hold great religious important amongst the locals. The whole route to bedini bugyal 
Easy to medium grade trekking. The enthralling treks take some. Through enchanting  valleys , hushed Hamlet's , and  counters and oak forests.  bedini  bugyal is the one of the most beautiful  Meadows in india. Bedini bugyal provides breathtaking views of the Trisul peak and Nanda Ghunti peaks. For wildlife and nature- photographers , bedini bugyal offers slot of opportunities to capture nature at its best.
Wan is the last village on route bedini bugyal. Varied colors and diversified splendor of nature  can be seen on this enchanting trek  to bedini bugyal. The reflections of the majestic Trisul peak on the crystal clear water of bedini kund  is purely enchanting. And the Ali bugyal is a vast expanse of green meadows with coniferous trees on the slope.
While  trekking to bedini bugyal and ali  bugyal you can further add a visit to the  mysterious Roop kund.  Roop kund is a popular place situated at an elevation of 5029 mts above the sea level. Trek to roop kund is very difficult. There are a gorgeous lake roop kund (lake). 

How to reach bedini bugyal

The starting point of the trek is Lohajang Pass which is well connected by motorable roads. The trek to Bedni Bugyal and Ali Bugyal is graded easy as it passes through the village. From Lohajang Pass the trek descends for 7 kms and then gradually ascends for 4 kms, finishing at Wan village. The moderate trek of 9kms from Wan goes through the deep forest of rhododendron and oak. 

Sunday, 19 February 2017

केदारनाथ दैवीय आपदा



जैसा की हम सभी लोग जानते है कि 2013 में उत्तराखंड  में दैवीय आपदा आयी थी। जिस कारण पुरे केदारनाथ धाम में तबाही  मच गयी थी। केदारनाथ में पंडित  रोशन त्रिवेदी ने बताया कि तबाही का ऐसा ख़ौफनाक मंजर न कभी देखा और न कभी सुना।केदारनाथ में  कई होटल , धर्मशालाए , घर और बैंक का नामोनिशान मिट गया।
16 जून सुबह 8:30 बजे अचानक केदारनाथ मंदिर से 4km दूर गाँधी  सरोवर तेज आवाज के साथ फटा और और पूरे केदारनाथ  में बाढ़ आ गयी। जिससे बहुत से लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी । यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोन से विचार करे तो आपदा के यह कारण हो सकते है।
हिमलयी क्षेत्रों में तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है।ग्लोबल वार्मिंग सबसे ज्यादा असर हिमालयी क्षेत्रों में  साफ देखा जा सकता है। जिस कारण वातावरण में अनेक बदलाव देखे जा रहे हैं।
चिराबाड़ी ताल ने केदारनाथ में तबाही की नींव रखी। 14 -15  जून को मूसलाधार बारिश के हीने के कारण  ग्लेशियर खंडित हो गए और ताल में पानी भरने लगा। ताल के अत्यधिक भरने के कारण 16 जून को उसने के नदी का रूप ले लिया और पूरे केदारनाथ को तबाह कर दिया न सिर्फ केदारनाथ को ही नुकसान हुआ, बाढ़ ने रुद्राप्रयाग तक अपना कहर ढाया।
समुद्र तल से 4096 मीटर की ऊँचाई पर स्थित  चौराबड़ी ताल की सूरत ही बदल गयी इस ताल में 1948 में महात्मा गाँधी की अस्थिया विसर्जित की गयी थी। तब से इस ताल को गांधी सरोवर के नाम से भी जाना जाता है। आपदा आने से 5 - 6 साल पहले यह ताल सूखकर दलदल में तबदील हो गया था। ताल का जल स्तर 1 से 3 मीटर तक गिर गया  कुछ समय बाद ताल पानी से भर गया और ये करिश्मा ग्लेशियर के पिघलने के कारण हुआ होगा।

पॉच दशक का अध्ययन

पॉच दशक के अध्ययन  के अनुसार चौराबाड़ी ग्लेशियर औसतन 6.53 मीटर (21.4 फिट) पीछे खिसक गया था। हिमलयी ग्लेशियरों पर हुए अध्ययन पर गौर करें तो पिछले दस वर्षों में 67 फीसदी ग्लेशिर मौजूद हैं।जो कि 38000 वर्ग km  क्षेत्रफल में फैले हुए हैं। 19वीं शताब्दी के मुकाबले ग्लेशियरों की मोटाई 50 से 80 मीटर तक कम हो गयी है।
उत्तराखंड पर उच्च हिमलयी क्षेत्र में बने  ग्लेशियर  झीलों और अन्य झीलों का कितना खतरा मंडरा रहा है , यह केदारनाथ घाटी में 16 -17 जून को आयी आपदा में देखा जा सकता है। कई साल चौरबाड़ी झील की निगरानी कर रहे वैज्ञानिकों का कहना था रिकार्ड तोड़ बारिश के कारण झील में पानी खतरे के निशान से ऊपर चला गया था , जिसके कारण  झील  का वह हिस्सा जो मिट्टी के पहाड़ से बना था , वह  टूट गया। वैज्ञानिकों ने इस आशंका को निर्मूल बताया की झील में कोई ग्लेशियर टूट कर गिरा था।
क्योकि कई सालों से वाडिया हिमालयन ऑफ जियोलॉजी, चौराबाड़ी झील की निगरानी कर रहा था। जब झील टूटी तो जन सामान्य अलर्ट करने का समय नही मिल पाया था । जो की साफ - साफ देखा गया था जिस कारण बहुत से लोगो को बचाया नही जा सका। परन्तु इसके बावजूद भी वह के लोगों और इंडियन आर्मी  की मद्त से बहुत से लोगो की जान बचाने में कामयबी हासिल कि।
यह झील कम से कम डेढ़ किलोमीटर में फैली और कहीं - कहीं  पर तो 50 मीटर तक गहरी थी।आपदा आने से पहले मई में मुश्किल डेढ़ मीटर पानी था। इसके बावजूद भी यह आशंका थी कि कहीं यह झील पानी से पूरी तरह भर गई तो हालत बिगड़ सकती है। परन्तु इसके निगरानी से जुड़े वैज्ञानिको  के अनुसार पिछले कई सालों से इस झील में पानी की मात्रा में कोई परिवर्तन नही देखा गया था। परंतु  16 - 17 जून को जो हुआ वह अप्रत्याशित था।वैज्ञानिको के अनुसार भरी बारिश के कारण झील में तेजी से पानी भरा।और भारी बारिश के कारण बर्फ भी तेजी से पिघली।  जिस कारण  झील में पानी लबालब भरा और मिट्टी वाला हिस्सा टूट जाने से इस झील ने एक दैत्यकारी रूप ले लिया और पूरे केदारनाथ को तबाह कर दिया। 

Friday, 17 February 2017

the history of kedarnath temple

हमारा पूरा भारत देश ही तीर्थों का एक देश है , किन्तु उत्तराखंड के तीर्थों एक अपनी विशेषता और अपना एक महत्व है। इसका एक कारण गंगा माँ और हिमालय का पवित्र सहयोग है। हिमालय और गंगा का योगदान भारतीय संस्कृति  सभय्ता व इतिहास में बहुत बड़ा महत्व रखता है।
तीर्थ वस्तुतः हिन्दू सांस्कृतिक अखण्डता के प्रतीक है।उत्तराखंड में सृष्टि के प्रारम्भिक काल से ही तीर्थो की परिकल्पना कर ली गयी थी। केदारनाथ धाम उत्तराखंड में ही विराजमान है । जिस कारण उत्तराखण्ड को केदार प्रदेश भी कहते है। और शिव को केदार नाम से भी जाना जाता है। केदारनाथ आनादि तीर्थ है । इसकी इतनी अधिक मान्यता है कि केदारनाथ कल्प ग्रन्थ में इसे 'देवानामपि दुर्लभम्' देवताओ के लिए दुर्लभ स्थान माना गया है।
केदारनाथ  भारतवर्ष के द्वादश ज्योतिलिंगो में से एक है। शिव पुराण के अनुसार जब महाराज का युद्ध समाप्त हुआ तो भगवान वेदव्यास ने पांडवो को केदार  की ओर गमन करने का आदेश दिया ताकि गौत्र हत्या के पाप से उन्हें  मुक्ति मिल सके,  किन्तु शिवजी उन्हें  गोत्र  का दोषी मानकर महिष रूप में भूमिगत होने लगे। भीम ने दौड़कर उनका पिछला भाग पकड़ लिया । और पांडवो की भक्ति और व्यकुलता को देखकर शिव ने उन्हें पूर्ण रूप में दर्शन दिए । तथा भीम द्वारा पकड़े गए पृष्ठ भाग की पूजा का आदेश देकर अंतर्धान हो गए। अग्र भाग नेपाल में प्रकट होकर पशुपति नाम से जाना जाता है। उस शिला के चार अन्य खंडित अंश  उत्तराखण्ड चार संस्थालो पर प्रकट हुए। जो इस प्रकार से है बहु- तुंगनाथ में  मुख - रुद्रप्रयाग में। नाभि- मदमहेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में। केदारनाथ सहित  उत्तराखंड पंच केदार नाम से सुविख्यात है।
केदार आराधना में कहा गया है
जो महागिरी हिमालय  के पास केदारश्रृंग के तट पर सदा निवास करते हुए मुनीश्वरो द्वारा पूजित होते है तथा देवता,असुर यक्ष और महान सर्प भी जिनकी पूजा करते है। उन एक कल्याणकारी भगवान केदारनाथ को में  नमन करता हूँ।

Wednesday, 15 February 2017

माँ गंगा के धर्ती पर आगमन की कथा

ये उस  समय की बात है, जब राजा चक्रवर्ती ने जन्म  लिया । जिन्हें सगर के नाम से पुकारा जाता है। जब इन्होंने  अशवमेघ यज्ञ किया तो उस यज्ञ के नियमानुसार यज्ञ का घोड़ा छोड़ा। यह घोड़ा स्वतंत्र विचरण करता हुआ जा रहा था कि भगवान इंद्र ने इसे पकड़कर कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया । जब बहुत दिनो तक घोड़ा वापस नही आया तो उसकी खोज करना आरंभ कर दिया गया। महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े को बंधा देखकर क्रोधित हो गए । इस सारी माया से अलग होकर महात्मा कपिल अपने ध्यान में मग्न रहे।
महराज सगर के पुत्रों ने  क्रोधित उनसे घोड़ो को बाँधने का कारण पूछा परन्तु ध्यान मग्न महात्मा उनके सवालों का उत्तर नही दे पाये। जिस कारण वे कुपित होकर उन्हें उल्टा सीधा कहने लगे। कुछ समय बाद उनका ध्यान भंग हुआ । तो यह दृश्य देखकर उन्हें बहुत क्रोध आ गया । और उन्हीने राजा के साठ हजार  पुत्रो को भस्म कर दिया । अनेक वर्षों के बाद इनके कुल में भागीरथ ने जन्म लिया । जब उन्हें इस सारी कथा का पता चला तो अपने पितरों को मोक्ष दिलाने के लिये उन्होंने केलाश पर्वत पर आकर अत्यधिक तपस्या की जिसके परिणाम स्वरूप माँ गंगा अविरल लोक कल्याण कर रही है।
गंगा तीन धाराओं में मृतयुलोक की तरफ बढी। जो धरा भागीरथ के पीछे आयी उसे भागीरथी कहते हैं।जो धारा श्रीमुख पर्वत के उत्तर की तरफ अलकापुरी को गयी उसे अलकनंदा  कहते हैं। जो धारा केदारनाथ को गयी उसे मन्दाकिमी कहते हैं।
मंदाकनी के दर्शन और स्पर्श से सम्पूण पाप विनिष्ठ होते है। भागीरथी का स्नान पूजनादि करने से मोक्ष प्राप्त होता है।और अलकनंदा का स्नान व पूजन करने से समस्त देवी देवता स्वयं कृपा करते है। गंगोत्रो में गंगा स्नान करके मुख्य मंदिर में दर्शन किये जाते हैं।जिसमे गंगा माँ की प्रतिमा है। 
पतित पवनी गंगा माँ का उद्गम स्थल गोमुख कहलाता है जो कि गंगोत्री से 28 km  की दुरी पर है।यहा पर स्वस्थ एवं साहसी लोगो को ही समुचित व्यवस्था करके जाना पड़ता है।

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